Friday, 23 December 2016

देश में 'सपने' दिखाने व 'तू-तू मैं-मैं' की राजनीति से ज़्यादा और कुछ नहीं ।


सपने देखना व दिखाना कोई बुरी बात नहीं परंतु यह सच तो नहीं कि सभी सपने सच्चे ही निकलें। सपने अक्सर वास्तविकता से परे ही होते हैं। मार्केटिंग का ज़माना है अतः पहले सपने दिखाओ और फिर बड़ा पैसा ख़र्च कर उसका प्रचार भी ख़ूब बड़ा करो, तो राजनीति में आज कल काम चल जाता है। सिद्धांत व प्रतिभा की बात तो बेमानी हो गयी है।
लोकतंत्र में सभी राजनीतिक दल यही सपने दिखा रहे हैं, कोई छोटे पैमाने पर और कोई बड़े पैमाने पर। देश में ग़रीबी व बेरोज़गारी से पार नहीं पाया जा रहा है। संसद व विधान सभाओं में 'तू-तू मैं-मैं' और भद्दी नोकझोंक को जनता ठगी सी देखती रहती है। विकास की बड़ी-२ बातें सभी दल करते हैं लेकिन विकास के नाम पर वादे ही अधिक होते है। यदि कुछ विकास हो भी रहा है वह 'सांकेतिक' अर्थात दिखावा मात्र ही अधिक है।
कोई 'चेहरों' की राजनीति कर रहा है तो कोई 'जाति व धर्म' के नाम पर ठगी कर रहा है। अब महापुरुषों के नाम पर भी राजनीति हो रही है, उन्हें भी जाति व राजनीतिक दलों में बाँट दिया गया है। अपनी बात के समर्थन में कुछ उद्धरण प्रस्तुत कर रहा हूँ:
राष्ट्रीय पार्टियों में भाजपा व कोंग्रेस दो ही प्रमुख दल हैं। भाजपा में यदि मोदी जी के चेहरे को आज अलग कर दिया जाए तो भाजपा में आज शायद नेतृत्वहीनता की स्थिति पैदा हो जाए। कुछ को छोड़ अधिकांश प्रदेशों में प्रदेश स्तरीय चमकदार/सर्वमान्य चेहरों का अभाव है। उत्तर प्रदेश में भी मोदी जी ही चेहरा हैं।
कोंग्रेस में गांधी परिवार को अलग कर दें तो लगता है कि कोई नेतृत्व है ही नहीं और न ही कभी गांधी परिवार से बाहर नेतृत्व विकसित होने दिया गया या फिर कोई नेतृत्व का दावा ठोकने का साहस ही कर पाया। पारिवारिक गुलामीयत की स्थिति है।
उत्तर प्रदेश के परिप्रेक्ष्य में सपा व बसपा में तो जो हाल है वह किसी से छुपा नहीं है। सपा एक परिवार व जाति की पार्टी है तो बसपा एक नेता व जाति के आस पास ही घूमती है। भ्रष्टाचार या अन्य विषयों पर जितनी भी बात करें, इन दोनो के विषय में कम ही लगेगी।
उपरोक्त सभी दलों ने उत्तर प्रदेश में कभी न कभी राज किया है और सबके अपने-२ वादे व दावे किए हैं। कुछ सही परंतु अधिकांश  ग़लत या झूँटे ही साबित हुए हैं।
उपेक्षित अयोध्या को ही देखें, सभी ने ठगा राम की इस नगरी को। बातें व वादे आज भी हो रहे हैं और पहले भी ख़ूब हुए। न मंदिर बना और न यहाँ विकास, झूँटे ख़ाली सपने ही दिखाए गए और लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ हुआ, यहाँ।
नोटबंदी का मुद्दा आज सामयिक है और जैसे सपने आज दिखाए जा रहे हैं और लोग आँख बंद कर विश्वास भी कर रहे हैं, आशा है कि सब नहीं तो कुछ तो इस बार पूरे होंगे। नोटबंदी से ग़रीबों का कुछ भला होगा और रोज़गार के अवसर भी बढ़ेंगे लेकिन कैसे होगा यह सब, भविष्य के गर्त में ही छुपा है.... कोई प्लान तो अभी दिखाई नहीं देता लेकिन सपने तो बड़े-२ दिखाए जा रहे हैं। पक्ष-विपक्ष में 'तू-तू मैं-मैं' भी ख़ूब हो रही है।
इस 'झूँटे सपने दिखाने' व ' तू-तू मैं-मैं' की राजनीति में यदि कोई ठगा जाता है तो जनता, कोई यदि जीतता है तो झूँठा नेता व गंदी राजनीति और कोई यही पराजित होता है तो जन-मानस का लोकतंत्र.... बाक़ी और कुछ मेरी समझ में नहीं आता... मैं कोई बुद्धिजीवी तो हूँ नहीं, मेरी  छोटी बुद्धि में इस चुनाव के मौसम में जो आया लिख दिया।
किसी को कुछ बुरा लगे तो माफ़ करना.... अंध-भक्ति का ज़माना है.... सच्चाई सबको पसंद नहीं .... लोग वही सुनना व देखना चाहते हैं, जिसे वे सही मानते हैं चाहे वह विवेकपूर्ण व तर्कसंगत हो अथवा नहीं  !!
जय हिंद .

No comments: